Puja Path Niyam: हिंदू धर्म में किसी भी देवी-देवता की पूजा के दौरान चरणामृत और पंचामृत का विशेष महत्व होता है। यह केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत लाभकारी माना जाता है। चाहे मंदिर में हो या घर में, पूजा-अर्चना के बाद चरणामृत और पंचामृत ग्रहण करना अनिवार्य होता है। इसे ग्रहण करने में तनिक भी विलंब नहीं करना चाहिए क्योंकि यह विशेष और महत्वपूर्ण होता है। इस लेख में हम चरणामृत और पंचामृत के महत्व, लाभ, निर्माण प्रक्रिया और नियमों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
चरणामृत: भगवान के चरणों का अमृत
चरणामृत का अर्थ और महत्व
चरणामृत का शाब्दिक अर्थ होता है भगवान के चरणों का अमृत। यह जल, जिसे भगवान की मूर्ति, शिवलिंग या किसी अन्य देवता के चरणों को धोकर तैयार किया जाता है, बहुत ही पवित्र और आध्यात्मिक रूप से प्रभावशाली माना जाता है।
शास्त्रों में चरणामृत के महत्व का वर्णन इस प्रकार किया गया है—
अकाल मृत्युहरणं, सर्व व्याधि विनाशनम्।
विष्णो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।।
अर्थात, भगवान विष्णु के चरणों का यह अमृतरूपी जल सभी पापों का नाश करता है, रोगों को दूर करता है और मोक्ष प्रदान करता है।
कैसे बनाया जाता है चरणामृत?
चरणामृत को विशेष विधि से तैयार किया जाता है ताकि उसमें औषधीय गुण समाहित हो सकें—
- तांबे के बर्तन में जल – तांबे का बर्तन प्रयोग करने से इसमें तांबे के औषधीय गुण आ जाते हैं।
- तुलसी के पत्ते – तुलसी को चरणामृत में मिलाने से यह और भी अधिक लाभकारी हो जाता है।
- तिल और अन्य औषधीय तत्व – कभी-कभी इसमें तिल और अन्य औषधीय सामग्री भी मिलाई जाती है।
मंदिरों और घरों में तांबे के पात्र में तुलसी डालकर चरणामृत रखा जाता है, जो हमेशा पवित्र और ऊर्जा से भरपूर होता है।
चरणामृत लेने के नियम
- चरणामृत हमेशा दाएं हाथ से लेना चाहिए।
- इसे ग्रहण करते समय श्रद्धा और भक्ति का भाव होना आवश्यक है।
- चरणामृत ग्रहण करने के बाद कुछ लोग सिर पर हाथ फेरते हैं, लेकिन शास्त्रों में इसे वर्जित माना गया है, क्योंकि इससे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
- मन को शांत रखकर और भगवान का स्मरण करते हुए चरणामृत ग्रहण करना चाहिए।
चरणामृत के लाभ
चरणामृत केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी होता है।
- रोग नाशक – तांबे में कई प्रकार के रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है।
- पौरुष शक्ति बढ़ाने में सहायक – आयुर्वेद के अनुसार, चरणामृत शरीर की ऊर्जा को बढ़ाने में मदद करता है।
- मस्तिष्क को शांति – तुलसी और तांबे का जल मस्तिष्क को ठंडक और शांति प्रदान करता है।
- बुद्धि और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला – नियमित रूप से चरणामृत ग्रहण करने से एकाग्रता और याददाश्त बेहतर होती है।
पंचामृत: पांच अमृतों का मिश्रण
पंचामृत का अर्थ और महत्व
पंचामृत शब्द का अर्थ है पांच अमृत। यह पांच पवित्र और शक्तिशाली पदार्थों के मेल से बनाया जाता है—
- दूध – यह शुद्धता और निष्कलंकता का प्रतीक है।
- दही – यह जीवन में शुभता और गुणों को अपनाने का संकेत देता है।
- घी – यह स्नेह और प्रेम का प्रतीक है।
- शहद – यह बल, शक्ति और ऊर्जा को दर्शाता है।
- शक्कर – यह जीवन में मिठास और मधुर व्यवहार का प्रतीक है।
पंचामृत का उपयोग भगवान के अभिषेक के लिए किया जाता है। यह न केवल आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण होता है बल्कि इसके कई स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं।
कैसे बनाया जाता है पंचामृत?
पंचामृत बनाने की विधि बहुत ही सरल होती है—
- 1 भाग दूध
- 1 भाग दही
- 1 भाग घी
- 1 भाग शहद
- 1 भाग शक्कर
इन सभी सामग्रियों को एक साफ बर्तन में मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है। इसे भगवान को अर्पित करने के बाद भक्तों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
पंचामृत के लाभ
पंचामृत स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक लाभकारी होता है।
- शरीर को पुष्ट और ऊर्जा से भरपूर बनाता है – इसमें मौजूद पोषक तत्व शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं।
- पाचन तंत्र को सुधारता है – दही और शहद के मेल से यह पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है।
- त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद – घी और दूध त्वचा की चमक को बनाए रखने में मदद करते हैं।
- मन को शांत और प्रसन्न करता है – पंचामृत में मौजूद शक्कर और दूध मानसिक तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक – पंचामृत केवल शरीर के लिए ही नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण होता है।
पंचामृत ग्रहण करने के नियम
- इसे हमेशा श्रद्धा और भक्ति के साथ ग्रहण करें।
- बहुत अधिक मात्रा में सेवन न करें, क्योंकि यह संतुलित मात्रा में ही लाभकारी होता है।
- इसे हमेशा स्वच्छ हाथों से लेना चाहिए।
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Brijendra
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